शहतूत यानी Mulberry cultivation (Morus spp) केवल फल देने वाला पौधा नहीं है, बल्कि भारत में रेशम उत्पादन यानी Sericulture की पूरी अर्थव्यवस्था का आधार है। रेशम के कीट Bombyx mori के लिए शहतूत की पत्तियां मुख्य आहार हैं। इसलिए इसकी व्यावसायिक खेती का मूल्य केवल पत्तियों या फलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अच्छी गुणवत्ता वाली पत्तियों के माध्यम से रेशम के कोकून उत्पादन से जुड़ जाता है।
भारत के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए शहतूत की अलग-अलग किस्में विकसित की गई हैं। V1, S36, S1635, S1, S13, S34, Kanva-2 आदि इसके प्रमुख विकल्पों में शामिल हैं। हालांकि किसान को किस्म का चुनाव स्थानीय जलवायु, सिंचाई, मिट्टी और रेशम विभाग की सलाह के अनुसार करना चाहिए।

Mulberry cultivation : (शहतूत की खेती)
शहतूत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे रेशम उत्पादन के लिए बार-बार पत्तियां प्राप्त करने वाली बहुवर्षीय फसल के रूप में विकसित किया जा सकता है। शहतूत की पत्ती की मात्रा और गुणवत्ता सीधे रेशम के कीटों के पालन तथा कोकून उत्पादन को प्रभावित करती है।
इसलिए यदि किसान के पास सिंचाई की सुविधा, रेशम कीट पालन का प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच है तो शहतूत की खेती को सामान्य फलदार खेती की तुलना में एक अलग प्रकार के कृषि-व्यवसाय के रूप में देखा जा सकता है।
शहतूत की खेती शुरू करने से पहले किन बातों की जांच करनी चाहिए?
सबसे पहले मिट्टी की जांच करानी चाहिए। अच्छी जलनिकासी वाली दोमट या चिकनी-दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। Central Silk Board के अनुसार लगभग pH 6.5–7.0 शहतूत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है, जबकि TNAU थोड़ा अम्लीय pH 6.2–6.8 को भी उपयुक्त बताता है।
खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। साथ ही यह देखना जरूरी है कि आसपास रेशम कीट पालन, कोकून बाजार या सरकारी रेशम विभाग की सहायता उपलब्ध है या नहीं।
शहतूत की खेती के लिए कैसी जलवायु चाहिए?
शहतूत अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। भारत में इसकी खेती उष्णकटिबंधीय से लेकर समशीतोष्ण क्षेत्रों तक की जाती है।
सामान्य रूप से गर्म और पर्याप्त नमी वाली परिस्थितियां अच्छी पत्ती वृद्धि में मदद करती हैं। कुछ क्षेत्रों में सिंचाई के सहारे वर्ष में कई बार पत्ती की कटाई की जाती है। इसलिए केवल वार्षिक वर्षा नहीं, बल्कि सिंचाई की उपलब्धता और जलनिकासी भी महत्वपूर्ण हैं।
शहतूत की प्रमुख किस्में कौन-कौन सी हैं?
भारत में क्षेत्र और खेती की स्थिति के अनुसार कई किस्मों का इस्तेमाल किया जाता है।
V1 एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक किस्म है। Central Silk Board के अनुसार यह दक्षिण भारत के कई सिंचित क्षेत्रों में अधिक उपयोग की जाती है और अच्छी परिस्थितियों में इसकी पत्ती उपज काफी अधिक हो सकती है।
इसके अलावा S36, S1635, S1, S799, S13, S34, Kanva-2, DD (Viswa), S54 आदि किस्में विभिन्न कृषि-जलवायु और सिंचाई परिस्थितियों के लिए अधिकृत या अनुशंसित की गई हैं।
प्रमुख किस्मों का संक्षिप्त डेटा
| किस्म | प्रमुख उपयोग/क्षेत्र | खेती की स्थिति |
| V1 | दक्षिण भारत सहित कई सिंचित क्षेत्र | सिंचित |
| S36 | कर्नाटक, तमिलनाडु आदि | सिंचित |
| S1635 | कई मध्य एवं पूर्वी क्षेत्र | सिंचित |
| S1 | उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार आदि | सिंचित/वर्षा आधारित |
| S13 | दक्षिण भारत के लाल मिट्टी वाले क्षेत्र | वर्षा आधारित |
| S34 | दक्षिण भारत की काली मिट्टी वाले क्षेत्र | वर्षा आधारित |
| Kanva-2 | दक्षिण भारत | सिंचित/वर्षा आधारित |
किस्म की अंतिम पसंद स्थानीय रेशम विभाग या कृषि वैज्ञानिक की सलाह से करना अधिक सुरक्षित है।
1 एकड़ में शहतूत की खेती का पूरा प्लान क्या हो सकता है?
एक एकड़ में शहतूत का वास्तविक खर्च क्षेत्र, पौध सामग्री, सिंचाई व्यवस्था, श्रम, खाद और खेती की पद्धति के अनुसार काफी बदल सकता है। इसलिए नीचे दिया गया प्लान योजना बनाने का मॉडल है, निश्चित लागत या लाभ की गारंटी नहीं।
1 एकड़ मॉडल
| कार्य | क्या करना है | अनुमानित योजना |
| भूमि चयन | अच्छी जलनिकासी वाली जमीन | मिट्टी जांच के बाद |
| भूमि तैयारी | गहरी जुताई और समतलीकरण | 2–3 जुताई आवश्यकता अनुसार |
| पौध सामग्री | स्वस्थ कटिंग/पौधे | प्रमाणित स्रोत से |
| किस्म | क्षेत्र के अनुसार | V1/S36/S1635/S1 आदि |
| सिंचाई | ड्रिप या अन्य नियंत्रित सिंचाई | उपलब्ध जल के अनुसार |
| खाद | मिट्टी परीक्षण आधारित | जैविक खाद + संतुलित पोषण |
| खरपतवार नियंत्रण | निराई-गुड़ाई/मल्चिंग | नियमित |
| छंटाई | पत्ती उत्पादन के उद्देश्य से | स्थानीय तकनीकी सलाह के अनुसार |
| पत्ती कटाई | रेशम कीट पालन के चक्र से जोड़ना | नियमित |
| बाजार | कोकून उत्पादन केंद्र/रेशम विभाग | पहले से संपर्क |
| अतिरिक्त व्यवसाय | रेशम कीट पालन | प्रशिक्षण के बाद |
शहतूत लगाने की विधि क्या है?
शहतूत को सामान्यतः कटिंग द्वारा प्रवर्धित किया जाता है। TNAU के अनुसार स्वस्थ 8–12 महीने पुराने पौधों से लगभग 15–20 सेंटीमीटर लंबी तथा 3–4 सक्रिय कलियों वाली कटिंग तैयार की जा सकती है। नर्सरी में जड़ विकसित कर पौधों को मुख्य खेत में लगाना स्थापना के लिए उपयोगी तरीका माना गया है।
भूमि को अच्छी तरह तैयार करके उचित दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं। दूरी का निर्धारण किस्म, मिट्टी, सिंचाई और खेती के उद्देश्य के अनुसार करना चाहिए।
क्या शहतूत की जैविक खेती संभव है?
हां, शहतूत में जैविक एवं कम-रासायनिक इनपुट वाली खेती की दिशा में काम किया जा सकता है। इसके लिए अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, जैव उर्वरक और मल्चिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
लेकिन यदि पत्तियां रेशम के कीटों को खिलाई जानी हैं, तो किसी भी कीटनाशक या जैविक उत्पाद का उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए। पत्तियों पर अवशेष रहने से रेशम के कीट प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सेरिकल्चर विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देना चाहिए।
शहतूत की खेती से किसान को लाभ कैसे मिलता है?
शहतूत की खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान इसे रेशम उत्पादन से जोड़ सकता है। यानी व्यवसाय केवल पौधे या पत्ती बेचने तक सीमित नहीं रहता।
यदि किसान के पास आवश्यक infrastructure और प्रशिक्षण है तो शहतूत की पत्तियों का उपयोग अपने ही रेशम कीट पालन में किया जा सकता है। इससे पत्ती → रेशम कीट → कोकून → बाजार का पूरा मूल्य-श्रृंखला मॉडल तैयार होता है।
भारत में सेरिकल्चर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार से जुड़ा हुआ है।
भारत में शहतूत की खेती कहां प्रमुख है?
शहतूत की खेती भारत के कई राज्यों में की जाती है। विशेष रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम तथा जम्मू-कश्मीर और हिमालयी क्षेत्रों में अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार इसकी खेती होती है। Central Silk Board ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए विभिन्न किस्मों को अधिकृत किया है।
इसलिए शहतूत को केवल दक्षिण भारत की फसल मानना सही नहीं होगा।
क्या शहतूत की खेती को आधुनिक तकनीक से किया जा सकता है?
बिल्कुल। आधुनिक शहतूत उत्पादन में ड्रिप सिंचाई, fertigation, मिट्टी परीक्षण, बेहतर किस्में, पौधशाला प्रबंधन, वैज्ञानिक pruning, जैविक इनपुट और रोग-कीट की निगरानी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
Central Silk Board ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए तनाव-सहनशील और उच्च पत्ती उत्पादन वाली किस्मों पर भी अनुसंधान किया है। उदाहरण के लिए कुछ विकसित सामग्री कम पानी, कम इनपुट या विशेष जलवायु परिस्थितियों के लिए परीक्षण/अनुशंसित की गई है।
शहतूत की खेती में सबसे बड़ी सावधानियां क्या हैं?
पहली सावधानी है बिना जांच के किस्म का चुनाव न करना। दूसरी, खेत में जलभराव रोकना। तीसरी, प्रमाणित पौध सामग्री का इस्तेमाल करना।
यदि लक्ष्य रेशम उत्पादन है तो पत्तियों पर रसायनों के अवशेष को लेकर विशेष सावधानी आवश्यक है। इसके अलावा पत्ती की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पोषण, सिंचाई और समय पर कटाई महत्वपूर्ण हैं।
क्या शहतूत की खेती के साथ दूसरी फसल ली जा सकती है?
कुछ परिस्थितियों में शहतूत के बीच उपलब्ध स्थान का उपयोग दलहनी या हरी खाद वाली फसलों के लिए किया जा सकता है। ICAR के एक अध्ययन में सिंचित शहतूत में विभिन्न spacing और intercrops के प्रभाव तथा अतिरिक्त आय की संभावनाओं का अध्ययन किया गया था।
हालांकि अंतरवर्ती फसल ऐसी होनी चाहिए जो शहतूत की जड़ों, पोषण और रेशम कीट पालन की जरूरतों से प्रतिस्पर्धा न करे।
शहतूत की खेती में लाभ और जोखिम
लाभ:
- रेशम उत्पादन से जुड़ने का अवसर
- बहुवर्षीय पौध प्रणाली
- बार-बार पत्ती उत्पादन
- विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में खेती की संभावना
- ग्रामीण रोजगार का अवसर
- आधुनिक सिंचाई और बेहतर किस्मों से उत्पादकता सुधारने की संभावना
जोखिम:
- रेशम कीट पालन से बाजार और प्रबंधन जोखिम जुड़ा है
- जलभराव से नुकसान हो सकता है
- रोग एवं कीट नियंत्रण जरूरी है
- गुणवत्तापूर्ण पत्ती उत्पादन के लिए नियमित देखभाल चाहिए
- शुरुआती निवेश और श्रम की आवश्यकता हो सकती है
Summary
Mulberry cultivation यानी शहतूत की खेती को केवल एक पौधे की खेती के रूप में नहीं, बल्कि Sericulture-based farming system के रूप में देखना अधिक उपयोगी है। भारत में इसके लिए V1, S36, S1635, S1, S13, S34 और अन्य क्षेत्र-विशिष्ट किस्में उपलब्ध हैं।
एक एकड़ में खेती शुरू करने से पहले मिट्टी, पानी, किस्म, पौध सामग्री, रेशम कीट पालन की सुविधा और कोकून बाजार की उपलब्धता की जांच करना सबसे महत्वपूर्ण है। सही तकनीक और स्थानीय विशेषज्ञों की सलाह के साथ शहतूत छोटे तथा मध्यम किसानों के लिए कृषि के साथ रेशम उत्पादन जोड़ने का अवसर बन सकता है।
7 महत्वपूर्ण FAQ
1. शहतूत की खेती किस काम के लिए की जाती है?
मुख्य रूप से रेशम के कीटों के लिए पत्तियां उपलब्ध कराने के लिए। इसके अतिरिक्त शहतूत के फल का उपयोग खाद्य एवं मूल्यवर्धित उत्पादों में भी किया जा सकता है।
2. शहतूत की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी अच्छी है?
अच्छी जलनिकासी वाली दोमट से चिकनी-दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। लगभग 6.5–7.0 pH को Central Silk Board उपयुक्त बताता है।
3. शहतूत की सबसे अच्छी किस्म कौन-सी है?
एक ही किस्म सभी क्षेत्रों के लिए सर्वोत्तम नहीं है। V1, S36, S1635, S1, S13 और S34 जैसी किस्में अलग-अलग परिस्थितियों के लिए उपयोग की जाती हैं।
4. क्या उत्तर प्रदेश में शहतूत की खेती होती है?
हां। उत्तर प्रदेश शहतूत आधारित सेरिकल्चर वाले राज्यों में शामिल है और कुछ किस्में उत्तर प्रदेश तथा उत्तर भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिकृत हैं।
5. क्या शहतूत की खेती वर्षा आधारित हो सकती है?
कुछ किस्में वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए अनुशंसित हैं, लेकिन पत्ती की नियमित और अच्छी उपज के लिए उपलब्ध सिंचाई महत्वपूर्ण लाभ देती है।
6. शहतूत की कटिंग कैसे तैयार की जाती है?
स्वस्थ मातृ पौधों से उपयुक्त semi-hardwood cuttings ली जाती हैं। TNAU लगभग 15–20 सेमी लंबी और 3–4 सक्रिय कलियों वाली कटिंग का उल्लेख करता है।
7. क्या शहतूत की खेती से रेशम उत्पादन किया जा सकता है?
हां। शहतूत की पत्तियां Bombyx mori रेशम के कीटों का मुख्य भोजन हैं। इसलिए शहतूत बागान और रेशम कीट पालन को एक संयुक्त कृषि-व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है।
संदर्भ
- FAO – Mulberry cultivation and utilization in India
- Central Silk Board – Mulberry Crop Production Technology
- TNAU Agritech – Mulberry Cultivation
- Central Silk Board – Authorized Mulberry Varieties
- ICAR – Indian Horticulture: Mulberry post-harvest handling and value addition
Disclaimer
यह लेख सामान्य कृषि एवं सेरिकल्चर जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। वास्तविक लागत, पौध संख्या, उत्पादन, बाजार मूल्य और लाभ क्षेत्र, किस्म, मौसम, सिंचाई, श्रम तथा स्थानीय बाजार के अनुसार बदल सकते हैं। व्यावसायिक खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विभाग, कृषि विश्वविद्यालय या Central Silk Board/राज्य रेशम विभाग से क्षेत्र-विशिष्ट सलाह लेना उचित है।








